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ब्रह्मांड की अज्ञात ताकत से क्या पर्दा उठेगा

रोशनी से उसका कोई नाता नहीं, उसे देख नहीं सकते, लेकिन वह हैचंद्रभूषण

फिजिक्स या नैचुरल फिलॉस्फी को लेकर कोई भी बुनियादी मिजाज की चर्चा अभी डार्क मैटर और डार्क एनर्जी पर आकर अटक जाती है। हाल में एक फंडामेंटल पार्टिकल म्यूऑन पर लिए गए दो असाधारण प्रेक्षणों को लेकर पूरी दुनिया में जबरदस्त सनसनी देखी गई। कई भौतिकशास्त्री इस बात को लेकर ही तरंगित दिखे कि इससे पार्टिकल फिजिक्स के स्टैंडर्ड मॉडल को लेकर अरसे से बनी संतुष्टि समाप्त होगी और वैज्ञानिक अपनी पूरी ताकत डार्क मैटर और डार्क एनर्जी जैसे बड़े रहस्यों को समझने में लगा सकेंगे। जाहिर है, सृष्टि के मूलभूत कारोबार में दिलचस्पी रखने वाले एक आम इंसान के लिए यह जानना ज़रूरी हो गया है कि ये दोनों चीज़ें आखिर हैं क्या, और विज्ञान के लिए इन्होंने अचानक इतना केंद्रीय महत्व कैसे ग्रहण कर लिया है।

पहली मुश्किल तो द्रव्य और ऊर्जा के इन रूपों के साथ डार्क जैसा साझा शब्द जुड़ा होने से पैदा होती है। डार्क सीक्रेट और डार्क मैजिक जैसी जगहों पर इसका इस्तेमाल गर्हित या त्याज्य जैसे खराब अर्थ में होता रहा है। लेकिन यहां डार्क का मतलब सिर्फ इतना है कि वैज्ञानिक इनके होने को लेकर तो आश्वस्त हैं, लेकिन इसके अलावा इनका कुछ भी सिर-पैर फिलहाल उनकी समझ से बाहर है। दूसरे शब्दों में कहें तो डार्क शब्द यहां ‘अज्ञात’ के अर्थ में आया है। उन्नीसवीं और बीसवीं सदी के संधिकाल के जीनियस फ्रांसीसी गणितज्ञ हेनरी प्वांकारे के जमाने में भी खगोलशास्त्रियों को डार्क मैटर का कुछ-कुछ अंदेशा होना शुरू हो गया था, लेकिन प्वांकारे ने इसके लिए डार्क के बजाय ‘ऑब्स्क्योर’ (अस्पष्ट या अव्यक्त) विशेषण का इस्तेमाल किया था।

सबसे पहले 1933 में एक गैलेक्सी क्लस्टर (नीहारिका समूह) के अध्ययन के दौरान यह बात उभरकर आई थी कि अंतरिक्ष में दर्ज की जाने वाली आकाशगंगा जितनी या उससे बड़ी चीज़ों का कुल वजन उनमें मौजूद तारों, ग्रहों, उपग्रहों और धूल वगैरह के सम्मिलित वजन जितना होने के बजाय उसका कई गुना होता है। कभी-कभी तो सौ गुने से भी ज़्यादा।

इन विशाल आकाशीय संरचनाओं में किसी भी उपाय से प्रेक्षित न की जा सकने वाली कोई चीज़ है, जिसमें वजन के अलावा दर्ज करने लायक और कुछ नहीं है, और जिसे समझने के लिए छोटे स्तर पर उसकी कोई बानगी भी मौजूद नहीं है, यह बात 1970 के दशक तक पक्की हो गई थी। फिर हमारी अपनी आकाशगंगा के अध्ययन से पता चला कि इसके बाहरी तारों की रफ्तार काफी तेज़ है। सौरमंडल की तरह शनि, यूरेनस और नेपच्यून जैसे बाहरी ग्रहों के अपनी कक्षा में तुलनात्मक रूप से धीमा, और धीमा होते जाने जैसा कोई मामला वहां नहीं है। यह तभी संभव था, जब इसमें बाहर कोई अनदेखा वजन मौजूद हो।

इस तरह डार्क मैटर ने अनुमान से हटकर एक ठोस चीज़ की शक्ल अख्तियार कर ली। फिर जल्द ही यह हिसाब भी लगा लिया गया कि यह अनजाना द्रव्य पूरे ब्रह्मांड में वजन के हिसाब से सामान्य द्रव्य का- जिसमें तारों, ग्रहों-उपग्रहों, ब्लैक होल और धूल-धक्कड़ से लेकर हम-आप भी शामिल हैं- लगभग छह गुना है। अभी तो नीहारिकाओं के गुरुत्वीय प्रेक्षणों में ऐसी जगहों पर भी भारी-भरकम गुरुत्व दर्ज किया जा रहा है, जहां तारे या तो नदारद हैं या उनकी संख्या बहुत कम है। इससे डार्क मैटर को गणना की चूक या किसी अवधारणात्मक गड़बड़ी का नतीजा मानने वाली सोच लगभग अप्रासंगिक हो गई है।

डार्क एनर्जी अलबत्ता बहुत हाल की चीज़ है और एक मामले में यह डार्क मैटर से भी कम ‘डार्क’ है। डार्क मैटर के साथ किसी भी उपाय से नज़र न आने वाली बात ज़रूर जुड़ी है, लेकिन डार्क एनर्जी का क़िस्सा 1998 में इसके नज़र आ जाने के साथ ही शुरू हुआ। ब्रह्मांड फैल रहा है, यह जानकारी 1930 के दशक में हो गई थी, जब आइंस्टाइन का जलवा अपने चरम पर था। यह और बात है कि ख़ुद आइंस्टाइन ब्रह्मांड के स्टेडी स्टेट (स्थिर अवस्था) मॉडल के पक्षधर थे और अपनी पूरी दिमाग़ी क्षमता उन्होंने इसके फैलाव से जुड़े प्रेक्षणों को बैलेंस करने में लगा दी थी। बहरहाल, ब्रह्मांड के फैलने की गति को लेकर लगातार काम चलता रहा और इस कोशिश में जुटे दो अमेरिकी और एक ऑस्ट्रेलियाई वैज्ञानिक एडम रीस, सॉल पर्लमटर और ब्रायन श्मिट 1998 में अपने इस प्रेक्षण से चकित रह गए कि जो गैलेक्सी धरती से जितनी दूर है, उसके दूर भागने की रफ्तार उतनी ही ज़्यादा बढ़ी हुई है। बाद में इसके लिए उन्हें नोबेल प्राइज भी मिला।

इस प्रेक्षण की व्याख्या करना तब तक के ब्रह्मांडीय मॉडल के बूते की बात नहीं थी। उस समय तक ऐसा माना जाता था कि ब्रह्मांड अपने प्रारंभ बिंदु बिग बैंग (महाविस्फोट) के झटके से ही फैल रहा है। जांचने की बात इतनी ही है कि आगे यह लगातार फैलता जाएगा, या एक बिंदु के बाद ठहर जाएगा, या फिर फैलाव पूरा होते ही सिकुड़ने लगेगा और सिकुड़ता हुआ वापस अपने प्रारंभ बिंदु में लौट आएगा (बिग क्रंच थीसिस)। ये सारे अनुमान ब्रह्मांड के त्वरित फैलाव की बात साबित होने के साथ ही बेमानी हो गए। ध्यान रहे, यह सिर्फ 22-23 साल पहले की बात है। त्वरित फैलाव के लिए किसी अतिरिक्त बल या ऊर्जा की ज़रूरत होती है। यह भला कहां से आ रही है? इसका स्वरूप क्या है? यह शुरू से किसी और रूप में मौजूद थी या अचानक पैदा हो गई? अगर बीच में पैदा हुई तो कब? और सबसे बड़ा सवाल यह कि इस ऊर्जा का गणित क्या होगा?

इनमें से कुछ सवालों के जवाब आसानी से खोज लिए गए। ब्रह्मांड का फैलाव नापने के लिए इन वैज्ञानिकों ने इसके सबसे प्रामाणिक उपाय 1-ए सुपरनोवा का सहारा लिया था, जिसे मानक मोमबत्ती (स्टैंडर्ड कैंडल) का दर्जा हासिल है। 1-ए सुपरनोवा वाइट ड्वार्फ तारों के किसी और तारे से जुड़ने पर होने वाले विस्फोट को कहते हैं। इसका सीधा सा फॉर्म्युला है। 30 लाख टन प्रति घनमीटर से ज़्यादा घनत्व वाला द्रव्य जब 50 करोड़ डिग्री सेल्सियस से ज़्यादा तापमान पर पहुंचता है तो उसमें कार्बन फ्यूजन होता है और इस विस्फोट में वह एक ख़ास रोशनी के साथ धधकता है। वाइट ड्वार्फ तारे किसी और तारे के विस्फोट के बाद बची हुई उसकी धुरी हुआ करते हैं और बहुत लंबा जीते हैं। एक मीटर लंबाई, चौड़ाई और ऊंचाई वाले बक्से में 20 लाख जवान भारतीय हाथियों जितना या इससे भी ज़्यादा वजन पूरे ब्रह्मांड में वाइट ड्वार्फ नाम की इस अजूबा जगह पर ही पाया जाता है। और 50 करोड़ डिग्री तापमान के बारे में तो सोचना भी सिरदर्द को न्यौता देने जैसा है।

ऐसे तारों का 1-ए सुपरनोवा की गति को प्राप्त होना वैज्ञानिकों को अरबों प्रकाश वर्ष दूर तक झांक लेने का मौका देता है। जैसे अंधियारी रात में जुगनुओं को देखकर हम यह जान लेते हैं कि वे कितनी दूर चमक रहे हैं, वैसी ही भूमिका अपनी सुपरिभाषित रोशनी के चलते अंतरिक्ष में 1-ए सुपरनोवा निभाती है। इन मानक मोमबत्तियों के प्रेक्षण के आधार पर वैज्ञानिक इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि अब से कोई छह अरब साल पहले तक (मोटे तौर पर सूरज की पैदाइश के थोड़ा पहले) ब्रह्मांड में डार्क एनर्जी का कोई प्रभाव नहीं था। बिग बैंग को तब तक सात-आठ अरब साल बीत चुके थे और ब्रह्मांड के फैलाव की गति स्थिर होने के क्रम में मंद पड़ने की तरफ बढ़ रही थी। फिर अचानक यह बहुत तेज़ी से फैलना शुरू हो गया और इसके फैलने की रफ्तार दिनोंदिन तेज़ से तेज़तर होती चली गई।

वैज्ञानिक अभी तक सृष्टि के प्रारंभ बिंदु से लेकर वर्तमान तक और संभवतः भविष्य में भी विज्ञान के नियमों को एक समान मानते आए हैं। अभी उनके सामने चुनौती न सिर्फ ब्रह्मांड रचना के नियम खोजने की है, बल्कि उन्हीं नियमों में कोई ऐसी गुंजाइश भी ढूंढ निकालने की है, जो बीच रास्ते में ही डार्क एनर्जी जैसे आश्चर्य को जन्म दे सके।

डार्क मैटर पर वापस लौटें तो मामला सिर्फ उसके नज़र न आने का नहीं है। बहुत सारी चीज़ें हमारी प्रेक्षण की सीमाओं के चलते नज़र नहीं आतीं। सूरज के अलावा बाकी तारों के भी ग्रह होते हैं या नहीं, तीस साल पहले तक यह हम नहीं जानते थे। क्योंकि तारों की तरह ग्रह प्रकाश नहीं छोड़ते। वे सिर्फ थोड़ा सा प्रकाश परावर्तित करते हैं जो उनके तारे की चमक में खो जाता है। ब्लैक होल को सिद्धांततः नहीं देखा जा सकता क्योंकि वह न तो प्रकाश छोड़ता है, न ही परावर्तित करता है। प्रकाश किरणों को अपनी तरफ झुकाने की प्रवृत्ति के चलते ग्रैविटेशनल लेंसिंग उनकी शिनाख्त का जरिया बनती है और इर्दगिर्द घूमने वाली तपती गैसों से उनकी छाया की तस्वीर भी उतारी जा सकती है।

लेकिन डार्क मैटर का तो प्रकाश के साथ कोई लेना-देना ही नहीं है। वह न तो इसे छोड़ता है, न परावर्तित करता है, न इसकी दिशा मोड़ता है, न ही इसे सोखता है। ऐसे में उसके बारे में अटकलबाजी के अलावा इतना ही किया जा सकता है कि ग्रैविटेशनल मैपिंग से उसके ढूहों का नक्शा बना लिया जाए। बहरहाल, इससे डार्क मैटर का महत्व रत्ती भर भी कम नहीं होता। ब्रह्मांड के नक्शे में गैलेक्सियों के झुंड बेतरतीबी से नहीं बिखरे हुए हैं। समय के आरपार फैले मकड़ी के थ्री-डाइमेंशनल जाले जैसी उसकी स्पष्ट संरचना यहां दिखाई पड़ती है। डार्क मैटर की भूमिका इस ब्रह्मांडीय संरचना की नींव जैसी है।

बिग बैंग के ठीक बाद जब ब्रह्मांड में सिर्फ ऊर्जा रही होगी और पदार्थ अपनी बिल्कुल शुरुआती अवस्था में रहा होगा, तब उसका किसी ढांचे में बंधना शायद ही संभव होता, क्योंकि हर तरफ ऊर्जा की भरमार उसे सेटल ही नहीं होने देती। डार्क मैटर का ग्रैविटी के अलावा और किसी भी मूलभूत बल से कोई लेना-देना अबतक नहीं पाया गया है। लिहाजा सृष्टि की सुबह में संभवतः उसी ने वह ढांचा मुहैया कराया होगा, जिस पर धीरे-धीरे ब्रह्मांड की पूरी इमारत खड़ी हुई। ऐसे में विज्ञान के लिए यह सवाल अभी अपने आप सबसे बड़ा हो जाता है कि इस डार्क मैटर की बनावट क्या है। इसके लिए अगर कण भौतिकी के स्टैंडर्ड मॉडल में कुछ गुंजाइश बनती है तो शायद डार्क एनर्जी पर भी कुछ रोशनी पड़े।

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Asteroid Warning: धरती से टकराया ऐस्‍टरॉइड तो आएगी तबाही, आपातकालीन प्‍लान बनाने के लिए जुटेंगे विशेषज्ञ

Asteroid News: दुनियाभर के वैज्ञानिक इस महीने की आख‍िर में व‍ियना में बैठक करने जा रहे हैं। इस बैठक में धरती पर ऐस्‍टरॉइड के टकराने के खतरे के बारे में चर्चा होगी। वैज्ञानिकों का अनुमान है क‍ि अगर ऐस्‍टरॉइड धरती से टकराता है तो शरणार्थी संकट पैदा हो जाएगा।

लंदन
धरती से ऐस्‍टरॉइड के टकराने की आशंकाओं के बीच विशेषज्ञों ने आगाह किया है कि अगर ऐसा संकट कभी आता है तो इससे न केवल तबाही आएगी बल्कि दुनिया में मानवाधिकारों का गंभीर संकट पैदा हो जाएगा। उन्‍होंने कहा कि अगर ऐस्‍टरॉइड के टकराने का खतरा मंडराता है तो इससे विश्‍वभर में शरणार्थियों का बड़ा संकट शुरू हो जाएगा और लोग यूरोप तथा अमेरिका को छोड़कर एशिया, पश्चिम एशिया और प्रशांत महासागर की ओर जा सकते हैं।

इसी खतरे को देखते हुए अंतरिक्ष विशेषज्ञ इस महीने एक साथ आ रहे हैं ताकि ऐस्‍टरॉइड के धरती से टकराने की सूरत में एक आपातकालीन प्‍लान बनाया जा सके। विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि हमें न केवल ऐस्‍टरॉइड के टकराने के शुरुआती असर से निपटने की तैयारी करनी होगी बल्कि उसके बाद पैदा होने वाले मानवाधिकारों के संकट से निपटने के लिए तैयार रहना होगा।

पूरी दुनिया में शरणार्थी संकट पैदा हो जाएगा
वियना में आगामी 26 अप्रैल से 30 अप्रैल के बीच में प्‍लेनेटरी डिफेंस कॉन्‍फ्रेंस होने जा रहा है। इस बैठक में अंतरिक्ष मामलों के विशेषज्ञ यह चर्चा करेंगे कि अगर कोई ऐस्‍टरॉइड जैसी चीज धरती के पास वास्‍तविक रूप से आती है तो उसे लेकर क्‍या करना चाहिए। वैज्ञानिकों एक कल्‍पना के ऐस्‍टरॉइड की मदद से अपनी तैयारियों को परखेंगे। साथ ही उससे बचाव के तरीकों पर काम करेंगे।

इस दौरान वैज्ञानिक यह जानने की कोशिश करेंगे कि यह ऐस्‍टरॉइड धरती के किस हिस्‍से से टकराएगा। वैज्ञानिकों का अनुमान है कि किसी छोटे ऐस्‍टरॉइड के टकराने से कुछ किलोमीटर तक और अगर कोई बड़ा ऐस्‍टरॉइड टकराता है तो उसका असर कई सौ किलोमीटर तक हो सकता है। उनका कहना है कि अगर हम पहले से तैयारी नहीं करते हैं तो इस विस्‍फोट में लाखों लोगों की जान जा सकती है। तटीय इलाकों में बाढ़ आ सकती है। इससे पूरी दुनिया में शरणार्थी संकट पैदा हो जाएगा। वैज्ञानिकों का अनुमान है कि अमेरिका और यूरोप में ऐस्‍टरॉइड टकरा सकते हैं जिससे एशिया में शरणार्थी संकट पैदा हो सकता है।

धरती को कितना नुकसान?
वायुमंडल में दाखिल होने के साथ ही आसमानी चट्टानें टूटकर जल जाती हैं और कभी-कभी उल्कापिंड की शक्ल में धरती से दिखाई देती हैं। ज्यादा बड़ा आकार होने पर यह धरती को नुकसान पहुंचा सकते हैं लेकिन छोटे टुकड़ों से ज्यादा खतरा नहीं होता। वहीं, आमतौर पर ये सागरों में गिरते हैं क्योंकि धरती का ज्यादातर हिस्से पर पानी ही मौजूद है।

अगर किसी तेज रफ्तार स्पेस ऑब्जेक्ट के धरती से 46.5 लाख मील से करीब आने की संभावना होती है तो उसे स्पेस ऑर्गनाइजेशन्स खतरनाक मानते हैं। NASA का Sentry सिस्टम ऐसे खतरों पर पहले से ही नजर रखता है। इसमें आने वाले 100 सालों के लिए फिलहाल 22 ऐसे ऐस्टरॉइड्स हैं जिनके पृथ्वी से टकराने की थोड़ी सी भी संभावना है।

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Asteroid से धरती को बचाने में जुटे वैज्ञानिक, Atom Bomb से किया जा सकता है हमला

Asteroid: अमेरिकी स्पेस एजेंसी नासा के अनुसार, 22 ऐसे एस्टेरॉयड हैं जिनके अगले 100 साल में धरती से टकराने की संभावना है. अगर कोई ऑब्जेक्ट 46.5 लाख मील प्रति घंटा यानी 74 लाख किलोमीटर प्रति घंटा की स्पीड से धरती की तरफ आता है तो एजेंसी उसे खतरा मानती है.

वॉशिंगटन: एस्टेरॉयड (Asteroid) के धरती से टकराने के खतरे को देखते हुए अमेरिकी वैज्ञानिकों ने इससे निपटने की तैयारी शुरू कर दी है. अमेरिकी वैज्ञानिक (American Scientists) इन एस्टेरॉयड को धरती की कक्षा (Earth’s Orbit) से दूर भेजने के एक वैकल्पिक रास्ते की खोज में जुटे हुए हैं. वैज्ञानिकों ने सलाह दी है कि एस्टेरॉयड के खतरे को देखते हुए परमाणु हथियारों (Nuclear Weapons) का इस्तेमाल किया जाना चाहिए. यह गैर-परमाणु (Non-Nuclear Weapons) हथियारों से बेहतर हैं.


परमाणु हथियारों का इस्तेमाल क्यों?

बता दें कि अमेरिका (US) के लारेंस लिवरमूर नेशनल लैब (Lawrence Livermoor National Lab) के वैज्ञानिक (Scientists) अमेरिकी एयर फोर्स (US Air Force) के टेक्निकल एक्सपर्ट्स की टीम के साथ काम कर रहे हैं. इस टीम में शामिल वैज्ञानिक लांसिंग होरान ने कहा कि परमाणु बम विस्‍फोट (Nuclear Explosion) के बाद होने वाले न्‍यूट्रॉन रेडिएशन (Neutron radiation) से एस्टेरॉयड से छुटकारा पाया जा सकता है. उन्‍होंने कहा कि एक्‍स-रे (X-Rays) की तुलना में न्‍यूट्रॉन (Neutron) ज्‍यादा कारगर साबित हो सकते हैं.

इस वजह से कारगर है न्यूट्रॉन रेडिएशन

होरान के मुताबिक, एस्टेरॉयड की सतह को न्‍यूट्रॉन ज्यादा गरम कर सकते हैं. न्‍यूट्रॉन एक्‍स-रे की तुलना में धरती की कक्षा से एस्टेरॉयड को हटाने में ज्‍यादा प्रभावी होंगे. जान लें कि एस्टेरॉयड को हटाने के 2 तरीकों पर विचार चल रहा है. पहला तरीका है एनर्जी के जोरदार हमले से एस्टेरॉयड को छोटे-छोटे टुकड़ों में तोड़ दिया जाए और दूसरा तरीका है कि एस्टेरॉयड के रास्‍ते को एनर्जी की मदद से बदल दिया जाए.




अमेरिकी वैज्ञानिक होरान ने कहा कि परमाणु हथियार वाले विकल्प का इस्तेमाल तब किया जाएगा जब बहुत कम समय बचेगा. अमेरिकी स्पेस एजेंसी नासा के अनुसार, 22 ऐसे एस्टेरॉयड हैं जिनके अगले 100 साल में धरती से टकराने की संभावना है.

बता दें कि अगर कोई ऑब्जेक्ट 46.5 लाख मील प्रति घंटा यानी 74 लाख किलोमीटर प्रति घंटा की स्पीड से धरती की तरफ आता है तो एजेंसी उसे खतरा मानती है. नासा सेंट्री (Sentry) सिस्टम के जरिए ऐसे खतरों नजर रखता है.

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क्रिप्टोकरेंसी एक्सचेंज Coinbase की लिस्टिंग से पहले ही ऑल-टाइम हाई पर Bitcoin की कीमतें, XRP आज 25% उछला


क्रिप्टोकरेंसी एक्सचेंज क्वाइनबेस (Coinbase) का IPO कल लॉन्च होगा। कंपनी की योजना खुद को NASDAQ पर लिस्ट कराने की है। Coinbase इस IPO के जरिये प्राइमरी मार्केट से 114.9 मिलियन डॉलर यानी करीब 856 करोड़ रुपये जुटाएगी। Coinbase की लिस्टिंग से पहले ही दुनिया की सबसे पॉपुलर किप्टोकरेंसी बिटक्वाइन (Bitcoin) की कीमतें अपने ऑल-टाइम हाई पर पहुंच गई हैं।

पिछले 24 घंटे में Bitcoin की कीमतों में करीब 5% की उछाल आई और एक बिटक्वाइन की कीमत 63,191.37 डॉलर यानी 47.66 लाख रुपये से अधिक के रिकॉर्ड लेवल पर पहुंच गई। भारतीय समय के मुताबिक शाम 5 बजे बिटक्वाइन 4.54% की तेजी के साथ 62,712.72 डॉलर यानी 47.30 लाख रुपये पर ट्रेड कर रही थी।

इस क्रिप्टोकरेंसी में सबसे अधिक तेजी

बिटक्वाइन जहां आज अपने रिकॉर्ड हाई पर पहुंच गई, वहीं एक और क्रिप्टोकरेंसी XRP Ripple की कीमतों में आज जबरदस्त चाल आई। पिछले 24 घंटे में XRP की कीमतों में 25% की शानदार उछाल आई है। एक XRP की कीमत आज 1.71 डॉलर तक पहुंच गई, जबकि आज यह 1.34 डॉलर के भाव पर खुली थी।



Binance Coin में भी जबरदस्त तेजी

क्वाइनबेस की लिस्टिंग की खबरों ने क्रिप्टोकरेंसी इंवेस्टर्स में उत्साह भरा है। इस वजह से आज दुनिया की सबसे बड़ी क्रिप्टोकरेंसी एक्सचेंज बिनांस (Binance) की क्रिप्टोकरेंसी Binance Coin में भी जबरदस्त तेजी आई और यह Bitcoin और Ether के बाद दुनिया की तीसरी सबसे वैल्यूएबल क्रिप्टोकरेंसी बन गई है। आज Ether की कीमतें भी 3.47% की उछाल के साथ 2227.89 डॉलर तक पहुंच गई।


लिस्ट होने वाला पहला क्रिप्टो एक्सचेंज

Coinbase का IPO यदि सफल होता है तो कंपनी Coin के नाम से NASDAQ पर लिस्ट होगी। इसी के साथ Coinbase पहला क्रिप्टोकरेंसी एक्सचेंज बन जाएगा जो NASDAQ पर लिस्ट होगा। IPO करने से पहले कंपनी ने इसी सप्ताह अपने तिमाही नतीजे जारी किए हैं। वर्ष 2021 की पहली तिमाही में कंपनी को टोटल रेवेन्यू 1.8 बिलियन डॉलर यानी 13,400 करोड़ रुपये से अधिक रहा।


Coinbase के मजबूत रेवेन्यू से यूएस मार्केट एक्सपर्ट्स को NASDAQ पर इसकी मजबूत लिस्टिंग होने की उम्मीद है। आपको बता दें कि Coinbase अपने प्लेटफॉर्म पर बिटक्वाइन (Bitcoin) सहित 29 विभिन्न क्रिप्टोकरेंसी ट्रेंडिंग की सुविधा देता है। इस क्रिप्टो एक्सचेंज की शुरुआत Airbnb Inc के इंडीनियर ब्रायन आर्मस्ट्रॉन्ग और Goldman Sachs के Fred Ehrsam ने 2013 में की थी।



ऐसा है इसका बैलेंसशीट

वर्ष 2021 की पहली तिमाही में कंपनी टोटल रेवेन्यू 1.8 बिलियन डॉलर रहा, वहीं कंपनी के नेट इनकम 800 मिलियन डॉलर रहा। Coinbase के पास 5.6 करोड़ वेरिफाइड यूजर हैं। कंपनी को इस तिमाही जितना रेवेन्यू मिला है, उतना राजस्व पिछले 2 साल मिलकार नहीं था। इस आईपीओ के बाद Coinbase का वैल्यूएशन 100 बिलियन डॉलर हो जाएगा।

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Explained: क्या NASA का अगला टेलीस्कोप धरती पर तबाही ला सकता है?

नासा (NASA) की योजना जल्द ही जेम्स वेब स्पेस टेलीस्कोप (James Webb Space Telescope) लॉन्च करने की है. ये बेमिसाल टेलीस्कोप एलियंस से सीधा संपर्क (contact with aliens) कर सकता है. इसे लेकर ही वैज्ञानिक डरे हुए हैं.

नासा के साथ JWST को बनाने में यूरोपियन स्पेस एजेंसी और कनाडियन स्पेस एजेंसी का भी हाथ रहा
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अंतरिक्ष एजेंसी नासा साल 2022 तक एक बेहद खास टेलीस्कोप लॉन्च करने की योजना में है. जेम्स वेब स्पेस टेलीस्कोप (JWST) नाम के इस प्रोजेक्ट के बारे में कहा जा रहा है कि ये खासतौर पर स्पेस में दूसरी दुनिया यानी एलियंस की पड़ताल करेगा. बहुत मुमकिन है कि इस अत्याधुनिक टेलीस्कोप से साथ हम एलियंस से संपर्क कर सकें. हालांकि विशेषज्ञ इसे धरती के लिए खतरनाक मान रहे हैं. उनका कहना है कि एलियंस से संपर्क हो पाने का अर्थ उन्हें अपनी तबाही के लिए बुलाना है.

हो रही है नए टेलीस्कोप की बात

कोरोना के दौर में भी अंतरिक्ष की दुनिया चुपचाप नहीं बैठी, बल्कि लगातार प्रयोग हो रहे हैं. इसी कड़ी में जेम्स वेब स्पेस टेलीस्कोप लाया जा सकता है. इसके बारे में माना जा रहा है कि ये अंतरिक्ष की दुनिया का बेमिसाल टेलीस्कोप होगा, जिसके सामने मौजूदा उपकरण कुछ भी नहीं होंगे. ये स्पेस में हमारी पहुंच को लाखों किलोमीटरों तक ले जाएगा. तो सबसे पहले तो समझते हैं कि आखिर किन खूबियों से ये टेलीस्कोप लैस होगा.

टेलीस्कोप को -400 डिग्री फैरनहाइट तापमान पर रखना होगा (Photo- snappygoat)

क्या कहते हैं विशेषज्ञ
नासा के साथ JWST को बनाने में यूरोपियन स्पेस एजेंसी और कनाडियन स्पेस एजेंसी का भी हाथ रहा है. इस इंफ्रारेड टेलीस्कोप का वजन 6 मैट्रिक टन होगा और इसकी धुरी धरती से 1.5 मिलियन किलोमीटर रहेगी. नॉर्थाप ग्रुमन एरोस्पेस सिस्टम्स (Northrop Grumman Aerospace Systems) के एस्ट्रोफिजिसिस्ट ब्लैक बुलक ने इस बारे में काफी पड़ताल की. वे इस प्रोजेक्ट का हिस्सा भी रह चुकी हैं. ट्रीहगर वेबसाइट ने उनके हवाले से इस टेलीस्कोप के बारे में कई जानकारियां दीं.

सूरज की रोशनी से बचाने के लिए टेनिस कोर्ट जैसी शील्ड
वे बताती हैं कि स्पेस में ये सबसे अनोखा टेलीस्कोप है, जिसे ठंडा रखने के लिए भी आधुनिकतम तरीके अपनाए गए. दरअसल लंबे समय तक गर्मी लगने पर टेलीस्कोप अपनी क्षमता खो सकता है, जिससे बचाने के लिए उसके चारों ओर सन शील्ड तैयार की गई. ये एक टेनिस कोर्ट जितनी लंबी-चौड़ी है, जो उसके लिए छाते की तरह काम करेगी. बता दें कि टेलीस्कोप को -400 डिग्री फैरनहाइट तापमान पर रखना होगा ताकि वो प्रभावी तरीके से काम कर सके.
मौजूदा टेलीस्कोप्स से सैकड़ों गुना शक्तिशाली
जेम्स वेब स्पेस टेलीस्कोप इस समय सबसे ताकतवर टेलीस्कोप्स से भी 100 गुना ज्यादा शक्तिशाली माना जा रहा है. जैसे नासा के हबल टेलीस्कोप (Hubble Space Telescope) से ही तुलना करें तो हबल जहां धरती के ऑर्बिट के एकदम पास है, वहीं JWST धरती से 1.5 मिलियन किलोमीटर की दूरी पर होगा. इससे फायदा ये है कि ये लाखों -करोड़ों किलोमीटर दूर तक अंतरिक्ष में देख सकेगा.

जेम्स वेब स्पेस टेलीस्कोप काफी ताकतवर माना जा रहा है-

क्या काम करेगा ये
हबल टेलीस्कोप अपनी अधिकतम क्षमता के साथ भी उतनी पुरानी गैलेक्सीज को नहीं देख पाता था, वहीं नए टेलीस्कोप के बारे में उम्मीद है कि वो पुरानी से पुरानी और नई से नई गैलेक्सी की जानकारी हम तक पहुंचा सकेगा. साथ ही ये भी देखा जा सकेगा कि दूसरे तारों में क्या-क्या फीचर हैं, जैसे क्या वहां पानी है, कैसा वातावरण है और किस तरह के केमिकल तत्व वहां हैं. इससे हम ज्यादा से ज्यादा एस्टेरॉइड्स को बेहतर तरीके से जान सकेंगे, जिससे सोलर सिस्टम को समझने में मदद मिलगी.

क्या एलियंस का भी पता लग सकेगा?
JWST के बारे में सबसे बड़ी खूबी जो बताई जा रही है, वो है धरती के आसपास या दूर-दराज में एलियंस की उपस्थिति का पता लगाना. इस बारे में बुलक का मानना है कि इस टेलीस्कोप की यही सबसे बड़ूी खूबी हो सकती है. हालांकि फिलहाल इस बारे में पक्के तौर पर नहीं कहा जा सकता कि टेलीस्कोप इसमें किस हद तक सफल होगा लेकिन जितने आधुनिक फीचर इसमें डाले गए, उससे ये अनुमान लगाया जा रहा है.

वैज्ञानिकों को डर है कि यह एलियंस को भी हमारी जानकारी दे सकता है- सांकेतिक तस्वीर (flickr)

वैसे तो ये प्रोजेक्ट इसी साल मार्च में लॉन्च होने जा रहा था लेकिन अब ये टल गया है. हो सकता है कि अगले साल की शुरुआत या फिर इसी साल के अंत में इसकी लॉन्चिंग हो जाए. हालांकि इस बीच कई एस्ट्रोफिजिसिस्ट इसे लेकर चेतावनी भी दे रहे हैं.
क्या डर है जानकारों को
इस शक्तिशाली टेलिस्कोप से कुछ वैज्ञानिकों को डर है कि यह एलियंस को भी हमारी जानकारी दे सकता है, ठीक वैसे ही जैसे हम उनकी जानकारी लेने की कोशिश में हैं. फिलहाल तक ऐसा कोई पक्का प्रमाण नहीं मिला है कि एलियंस अगर हैं तो उन्होंने धरती पर आने की कोशिश की है. लेकिन एक बार जानकारी मिलने के बाद वे भी हमारी धरती पर संपर्क करेंगे. ऐसे में अगर वे ताकतवर हों तो इस आशंका से भी इनकार नहीं किया जा सकता कि वे धरती पर कब्जा करने की सोचेंगे.

धरती पर कब्जे की आशंका जताई जा रही
अमेरिका के थ्योरेटिकल फिजिसिस्ट और लेखक मिचिओ काकू (Michio Kaku) ने ऑब्जर्वर के साथ बातचीत में कहा कि नया टेलिस्कोप लोगों को हजारों ग्रहों को देखने की ताकत तो देगा, लेकिन हमें उनके निवासियों तक पहुंचने के बारे में काफी सावधानी से सोचना चाहिए. जैसे ही टेलीस्कोप धरती की ऑर्बिट में पहुंचेगा, हम हजारों ग्रहों को देख सकेंगे और वे भी हमें देख पाएंगे. ऐसे में इस बात की संभावना है कि हम किसी दूसरे ग्रह की सभ्यता के साथ संपर्क में आ जाएं. ये खतरनाक हो सकता है.

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मंगल ग्रह के आसमान में बना इंद्रधनुष!, नासा के मार्स रोवर ने खींंची कमाल की फोटो, जानें कैसे हुआ ये

नासा के परसिवरेंस मार्स रोवर ने लाल ग्रह के आसमान में इंद्रधनुष की कमाल की फोटो को अपने कैमरे में कैद किया है। हालांकि नासा का कहना है कि ये इंद्रधनुष नहीं बल्कि कैमरे के लैंस का कमाल है।

वाशिंगटन (एजेंसी)। मंगल पर भेजे गए नासा के मार्स रोवर परसिवरेंस ने वहां के आसमान में एक कमाल की फोटो खींची है। इसमें मंगल के आसमान में इंद्रधनुष बना हुआ दिखाई दे रहा है, जो कि बेहद खूबसूरत भी है। ये पहला मौका है जब किसी रोवर ने धरती से इतनी दूर इस तरह की कोई चीज को कैमरे में कैद किया है।

नासा की तरफ से इसकी जानकारी ट्वीट कर दी गई है। साथ ही कहा गया है कि बहुत लोगों का कह रहे हैं कि क्‍या ये लाल ग्रह पर इंद्रधनुष है। इसके जवाब में नासा ने कहा है कि नहीं। नासा के मुताबिक मंगल ग्रह पर इंद्रधनुष हो ही नहीं सकता है।



नासा का कहना है कि इंद्रधनुष रोशनी के रिफ्लेक्‍शन और पानी की छोटी-छोटी बूंदों से बनता है, लेकिन मंगल ग्रह पर न तो इतना पानी मौजूद नहीं है और न ही इस अवस्‍था में मौजूद है और यहां पर वातावरण में तरल पानी के लिहाज से यहां बेहद ठंडा है। नासा ने बताया है कि दरअसल, मंगल ग्रह के आसमान में दिखाई देने वाली ये इंद्रधनुषी छटा रोवर के कैमरे में लगे लैंस की एक चमक है।


आपको बता दें कि नासा का वातावरण बेहद सूखा है जहां पर वातावरण में करीब 95 फीसद तक टॉक्सिक कार्बनडाईऑक्‍साइड मौजूद है। इसके अलावा 4 फीसद में नाइट्रोजन और अरगोन है और एक फीसद ऑक्‍सीजन और वाटर वेपर है। इस तरह से केमिकल और फिजीकली मंगल ग्रह धरती से काफी अलग है।

नासा के मार्स रोवर द्वारा ली गई इस इमेज की बात करें तो ये 18 फरवरी को उस वक्‍त ली गई थी जब रोवर ने मंगल ग्रह की सतह को छुआ था। नासा की तरफ से एक बयान जारी कर इसकी जानकारी दी गई है।


नासा के सोलर सिस्‍टम एक्‍सप्‍लोरेशन के प्रोग्राम एग्‍जीक्‍यूटिव डेव लावेरी का कहना है कि तस्‍वीर में नजर आने वाले रंगों की लाइन की वजह लाल ग्रह के आसमान में छाई धूल भी हो सकती है जो सूरज की रोशनी में चमक रही है।

इसमें कुछ कमाल लैंस की चमकक का भी हो सकता है। उनके मुताबिक जिस वक्‍त ये तस्‍वीर ली गई उस वक्‍त रोवर उत्‍तर दिशा की तरफ था और मार्स सोलर समय के मुताबिक उस वक्‍त दोपहर के दो बजे थे। कैमरा उस वक्‍त दक्षिण की तरफ था।

इस लिहाज से ये एक बेहतर समय है जबकि रोशनी की चमक रोवर के कैमरे पर पड़ सकती है। हालांकि कुछ जानकारों का ये भी मानना है कि इस तरह की फोटो आने की एक वजह आइसबो भी हो सकती है जो मास्र के पोलर क्षेत्र में हैं।


गौरतलब है कि नासा का परसिवरेंस फरवरी में लाल ग्रह के जेजीरो क्रेटर में उतरा था। इसका काम यहां पर जीवन तलाश करना है। मंगल पर भेजा गया नासा का ये 5वां रोवर है। पहली बार नासा ने मंगल ग्रह पर एक हेलीकॉप्‍टर इंजेंवेनिटी भी भेजा है, जिसको फिलहाल इसकी सतह पर उतार दिया गया है। इसकी उड़ान के साथ ही नासा एक और इतिहास रचने के करीब पहुंच गया है। ये उड़ान संभवत: गुरुवार को होनी है।

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ISRO Offers Free Online Course on Geographical Information System That Can Be Completed in Four Days

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ISRO has Invited applications from students and professionals for a free online course on Geographical Information System for Supply Chain Management. The course is being offered as part of the Indian Space Research Organisation’s outreach program through its centre the Indian Institute of Remote Sensing (IIRS). The course, which will be conducted online due to the pandemic, can be completed in four days.

The course is being organised by the Geoinformatics Department of IIRS, and the content will be delivered by experts in their respective fields. ISRO says that it also plans to offer niche internships to graduates from top B-schools in these areas. The institute is also fully capable of offering short-term in-house training on the respective subjects. The course will be conducted from 26 to 30 April 2021.

What the ISRO Free Online Course on GIS for Supply Chain Management Will Cover
Geographical Information System (GIS) is basically a technology that is capable of capturing, storing, manipulating, visualising and analysing location-based data. Some of the advanced technology that GIS includes are satellite-based imaging, location-based services, spatial sciences and information technology. The technology has a wide range of applications and has already found its way into the mobile phones of consumers as well as e-commerce deliverables.

In the same context, a GIS-based Supply Chain Management (SCM), which is being widely adopted by industries these days, can greatly enhance the effectiveness and profitability of a supply chain. This course aims at giving an introduction on such technologies to participants. The course content will be market-driven and will provide an understanding of how these technologies are being adopted by raw material suppliers, processing units, and distribution centers among others.



Who can Take the ISRO Free Online Course?
This course has been designed for the benefit of the following participants:

Students studying business management, logistics and other related fields.
Management professionals are who interested in GIS or location-based decision making.
Start-ups and innovation centers.
How to Apply for ISRO Online Course?
Firstly, participants need to know to apply for the course a designated coordinator from the institute of participants will have to first get their organisation registered as the nodal centre with IIRS in order to help participants take the course. All the participants will then have to register online through the registration page on the website by selecting their organisation as the nodal center.



How to Get ISRO Certificate for the Course?
Participants are usually provided with certificates for attending free online courses, and the same can be obtained by ensuring 70 percent attendance. All certificates will be sent to the coordinator of the nodal centres, and the distribution of certificates will be taken care of by the coordinator.



What is IIRS Outreach Program?
IIRS is a training and educational institute set up by ISRO for developing trained professionals in the field of remote sensing, geoinformatics and GNSS technology for natural resources, environmental and disaster management. The IIRS outreach program, which was started in 2007, aims at giving free training to students, professionals, enterprises and government organisations on the emerging areas of geospatial technology.

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NASA detects new Asteroid 2021 AF8 moving towards Earth at speed of 9 km per second

Scientists have said that this asteroid will pass safely from a distance of about 3.4 million kilometers from the Earth.

After the God of destruction, asteroid Apophis, and the largest asteroid in the year 2021, NASA has detected another asteroid heading towards the Earth with a much faster pace than the previous ones.


The asteroid is the size of a football field and that is why NASA scientists are keeping a close eye on the asteroid named AF8. According to scientists, this asteroid will pass near the Earth on May 4.


NASA estimates that this asteroid ranges in size from 260 to 580 meters. This asteroid was first discovered by scientists in the month of March.

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The US Space Agency said that this Asteroid AF8 is much smaller than other large asteroids that have passed by the Earth in space, but it is still very dangerous. The agency said that the 2021 AF8 asteroid is passing near the Earth at a speed of 9 km per second.


Scientists have said that this asteroid will pass safely from a distance of about 3.4 million kilometers from the Earth.


Even after this, astronomers are closely monitoring this Apollo-based asteroid. This asteroid has been classified by NASA as a potentially dangerous asteroid.

NASA’s Sentry System already monitors such threats. There are currently 22 such asteroids that have little chance of hitting the Earth for the coming 100 years.


The first and largest Asteroid 29075 (1950 DA) in this list which is not going to come till 2880. It is also three times the size of the Empire State Building in the United States and was once believed to have the highest probability of hitting the Earth.



What are Asteroids?

Asteroids are rocks that revolve around the sun like any planet, but are much smaller than planets in size.


Most of the asteroids in our solar system are found in the asteroid belt in the orbit of Mars and Jupiter. Apart from this, they rotate in the orbit of other planets and revolve around the sun as well.

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Scientists discover ‘safest place’ to live in galaxy

Astronomers have found the safest place to live in the galaxy after much research.For this, scientists had to investigate the entire galaxy. Surprisingly, the planet we humans are living on.

अंतरिक्ष विज्ञानियों ने काफी रिसर्च के बाद आकाशगंगा में रहने के लिए सबसे सुरक्षित स्थान खोज लिया है. इसके लिए वैज्ञानिकों को पूरे आकाशगंगा की जांच करनी पड़ी. हैरानी की बात ये है कि हम इंसान जिस ग्रह पर रह रहे हैं, वो काफी ज्यादा सुरक्षित स्थान पर हैं. लेकिन अगर आप पिछले साल की कोरोना महामारी से ऊब कर किसी और ग्रह पर जाने की योजना बना रहे हैं तो यकीन मानिए आपके लिए आकाशगंगा का केंद्र सबसे ज्यादा सुरक्षित स्थान होगा.

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इटली के इनसुब्रिया यूनिवर्सिटी (Insubria University) के अंतरिक्ष विज्ञानियों की टीम ने इस स्टडी को किया है. इस टीम के प्रमुख और एस्ट्रोनॉमर रिकॉर्डो स्पिनेली ने कहा कि अंतरिक्ष में हुए विस्फोट (Cosmic Explosion) की वजह से कई जीवों का अंत हो चुका है. अंतरिक्ष के विस्फोट यानी सुपरनोवा, गामा-किरणों का फूटना, उच्च-ऊर्जा वाले कणों का फैलना और रेडिएशन DNA को फाड़ सकते हैं, ये जीवन को खत्म कर सकते हैं.

इन खतरों से सुरक्षित स्थान को खोजना आसान नहीं था. आकाशगंगा में कई ऐसी जगहें हैं जो ऐसे खतरों से भरी पड़ी हैं. रिकॉर्डो कहते हैं कि ताकतवर कॉस्मिक एक्सप्लोशन को अनदेखा नहीं कर सकते. ये जीवन के अस्तित्व के लिए खतरा है. इन विस्फोटों की वजह से गैलेक्सी में जीवन का विकास बाधित हुआ है

रिकॉर्डो और उनकी टीम ने सबसे दो चीजें खोजी. सबसे खतरनाक और सबसे सुरक्षित स्थान. इसके लिए इन लोगों ने आकाशगंगा के 11 बिलियन साल पुराना इतिहास खंगाला. जिससे पता चला कि हम अभी आकाशगंगा में जहां रह रहे हैं वो सबसे सुरक्षित बेल्ट में आती है. जबकि करोड़ों साल पहले आकाशगंगा के निर्माण के समय इसका सबसे सुरक्षित स्थान इसका आखिरी छोर थे.

किसी ग्रह को रहने योग्य बनने के लिए जरूरी है वहां पर उसके तारे के साथ सामंजस्य हो. यानी सूरज से धरती को पर्याप्त गर्मी मिले. न कम न ज्यादा. इसके अलावा अंतरिक्ष से आने वाली मुसीबतों से ग्रह दूर रहे. जैसे- रेडिएशन, सुपरनोवा, गामा किरणों का बहाव, उच्च ऊर्जा वाले कण और सौर तूफान. इन सारे खतरों से फिलहाल धरती सुरक्षित है. इसलिए ऐसा कहा जा सकता है कि हम आकाशगंगा के सबसे सुरक्षित स्थानों में से एक में रह रहे हैं.

सुपरनोवा, गामा किरणों का विस्फोट, खतरनाक स्ट्रीम्स, उच्च-ऊर्जा वाले कण ये सारे प्रकाश की गति से बहते हैं. अगर इनके सामने किसी भी प्रकार का जीवन आता है तो ये उसे नष्ट कर देते हैं. इतना ही नहीं ऐसे ग्रहों को भी खत्म कर सकते हैं जिनपर जीवन है या वो निर्जीव ग्रह हैं. इसलिए वैज्ञानिकों को लगता है कि हमारे सौर मंडल में बाकी ग्रहों पर भी जीवन रहा होगा लेकिन वो इन्हीं वजहों से खत्म हो गया हो.

रिकॉर्डो कहते हैं कि अंतरिक्षीय विस्फोट के आसपास के ग्रहों पर तो जीवन का पूरा सफाया हो गया होगा. 45 करोड़ साल पहले ओर्डोविसियिन (Ordovician) नाम का एक ग्रह था, जिसे दूसरी धरती कहा जाता था. इस पर मास एक्सटिंक्शन (Ordovician Mass Extinction) यानी सामूहिक विनाश होने की वजह आसपास हुआ गामा-किरणों का विस्फोट रहा होगा. अब आकाशगंगा में इसके बचे हुए हिस्से ही मिलते हैं. धरती बच गई क्योंकि इसकी दूरी और सौरमंडल का प्रभाव इसे बचा ले गया.

वैज्ञानिकों ने जानलेवा रेडिएशन को लेकर भी मॉडल्स और नक्शे बनाए. पता चला कि शुरुआत में गैलेक्सी का अंदर वाला हिस्सा, जो कि 33 हजार प्रकाशवर्ष बड़ा था, वह रहने योग्य नहीं था. क्योंकि यहां पर ऐसे तारे थे जिनका रेडिएशन बेहद खतरनाक था. यहां विभिन्न प्रकार के विस्फोट होते रहते थे. लेकिन आकाशगंगा का बाहरी इलाका सुरक्षित था

600 करोड़ साल पहले हमारी आकाशगंगा का स्टर्लाइजेशन (Sterilization) यानी सफाई हो रही थी. जैसे-जैसे गैलेक्सी की उम्र होती चली गई, विस्फोट होने कम हो गए. आज की तारीख में आकाशगंगा के अंदर घेरा है जो इसके केंद्र से 6500 प्रकाशवर्ष की दूरी पर है. जबकि 600 करोड़ साल पहले ये घेरा 26 हजार प्रकाश वर्ष की दूरी पर था. आज भी 6500 प्रकाशवर्ष से लेकर 26 हजार प्रकाशवर्ष के बीच की दूरी आकाशगंगा में रहने के हिसाब से सबसे सुरक्षित है.

आकाशगंगा के केंद्र में सुपरनोवा और अन्य अंतरिक्षीय गतिविधियां होती रहती हैं. लेकिन बाहरी छोर पर ये कम हैं. अगर भविष्य की बात करें तो हमारी आकाशगंगा अब जीवन को पनपने का माहौल बना रही है. अब ऐसी घटनाएं नहीं हो रही हैं, जिससे पूरे के पूरे ग्रह खत्म हो जाएं. या उनपर बसा जीवन नष्ट हो जाए.

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NASA’s Curiosity Rover sent selfie from Mars, showing rocky sight of red planet

Washington
NASA’s Curiosity Rover has started working on a rock on Mars since early March. It is named Mont Mercou.The 6-meter-high rock is taken by Rover in a selfie. In the selfie, the rover is seen in front of the rock and the new drill hole is also seen on Nontron, a sample rock. This is the 30th sample of the rover.

This selfie is made up of 60 photographs taken by Mars Hand Lens Imager (MAHLI). It is mounted on the rover’s robotic arm. These photos were mixed with 11 photos taken from Mastcam.Earlier, Rover’s Mastcam also took some panorama photos.

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Curiosity transformed the sample into powder after taking it and kept it safe.With their help, the team will study the structure of the rock and try to find out how the history of Mars was. Mont Mercou is a place in France near the village named Nontron. On Mars, scientists found the clay mineral Nontronite which is found in Nontron. That is why this place was named after Nontron.

A few days ago Curiosity sent a video of Mars clouds. These views were captured in the cameras mounted on him.Eight new photos showed five-minute views from the navigation camera’s eye. They were seen moving like the clouds of the earth. These were shared by Scientist Paul Brynern of North Carolina State University.

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