साधारण शब्दों में कहें तो फोन में नेटवर्क ना होने के बावजूद ऐप की मदद से इंटरनेट और वाई-फाई वाले सारे काम हो जाएंगे। हालांकि Google का नया ऐप WifiNanScan फिलहाल डेवलपर्स के लिए बनाया गया है जिससे Wifi Aware के साथ एक्सपेरिमेंट किया जा सकता है।
यह Google की प्रतीकात्मक फाइल फोटो है।
नई दिल्ली, टेक डेस्क। Google ने एक नया ऐप लॉन्च किया है। इसका नाम WifiNanScan है। इस ऐप की मदद से यूजर बिना ब्लूटूथ और वाईफाई के अपने आसपास के स्मार्टफोन समेत अन्य डिवाइस को कनेक्ट कर पाएंगे। साधारण शब्दों में कहें, तो फोन में नेटवर्क ना होने के बावजूद ऐप की मदद से इंटरनेट और वाई-फाई वाले सारे काम हो जाएंगे। हालांकि Google का नया ऐप WifiNanScan फिलहाल डेवलपर्स के लिए बनाया गया है, जिससे Wifi Aware के साथ एक्सपेरिमेंट किया जा सकता है।
अगर आप Wifi Aware के बारे में नहीं जानते हैं, तो बता दें कि यह एक Neighbour Awareness Networkig है, जो बिना किसी एक्सटर्नर डिवाइस के एक स्मार्टफोन को दूसरे से कनेक्ट करने में मदद करता है। 9to5Google की रिपोर्ट के मुताबिक WifiNanScan ऐप सेलेक्टेड स्मार्टफोन पर ही चल सकेगा, जो एंड्राइड 8 और उससे हायर वर्जन को सपोर्ट करते हैं। इस ऐप की मदद से यूजर बिना ब्लूटूथ और वाईफाई के आपस में मैसेज और डेटा शेयर कर पाएंगे। Google के दावे के मुताबिक ये ऐप पूरी तरह से सुरक्षित है। इस ऐप की मदद से यूजर्स नेटवर्क की मदद से सुरक्षित तरीके से प्रिंटर पर डॉक्यूमेंट भेज सकते हैं।
यूजर्स को होंगे ये फायदे
Google ऐप के फोन में इंस्टॉल होने पर यूजर्स को किसी भी नेटवर्क पर लॉग-इन नहीं करना होगा। कंपनी का दावा है कि Wifi Aware ऐप की मदद से बिना इंटरनेट कनेक्शन के आप किसी भी रेस्टोरेंट में सीट बुकिंग और मूवी टिकट बुक कर पाएंगे। मतलब अगर आपके फोन में इटरनेट कनेशन नहीं मौजूद है, तब भी इंटरनेट वाले सारे काम किये जा सकेंगे। Google के इस ऐप को Google Play Store से डाउनलोड किया जा सकेगा। यह ऐप एक मीटर से लेकर 15 मीटर तक के दायरे तक काम करता है।
दुनिया की सबसे बड़ी और लोकप्रिय क्रिप्टोकरेंसी बिटकॉइन (Bitcoin) ने भले ही कई निवेशकों को मालामाल कर दिया है, लेकिन बिटकॉइन बनाने में जितनी बिजली खर्च होती है, उससे मुंबई जैसे बड़े महानगर की बिजली की जरूरत पूरी की जी सकती है। बिटकॉइन का सालाना कार्बन फुटप्रिंट मुंबई के बराबर है। दुनिया के संदर्भ में देखें तो यह स्लोवाकिया के बराबर है।
डच इकनॉमिस्ट एलेक्स डी व्रीज (Alex de Vries) की एक स्टडी के मुताबिक बिटकॉइन से हर साल 38.10 एमटी (मिलियन टन) कार्बन फुटप्रिंट पैदा होता है। एक स्टडी के मुताबिक मुंबई का कार्बन फुटप्रिंट करीब 32 एमटी और बेंगलोर का 21.50 एमटी है। हाल में माइक्रोसॉफ्ट के को-फाउंडर बिल गेट्स ने हाल में एक इंटरव्यू में कहा था कि बिटकॉइन में प्रति ट्रांजैक्शन जितनी बिजली खर्च होती है, उतनी किसी और में नहीं होती है।
हाई टेक कम्प्यूटर्स का इस्तेमाल बिटकॉइन सिक्के ढालकर बनाई जाती है जिसके लिए हाई टेक कम्प्यूटर्स का लंबे समय तक इस्तेमाल किया जाता है। बाजार में जितने ज्यादा सिक्के होंगे, नए सिक्के ढालने में उतना अधिक समय लगेगा और उतनी ज्यादा बिजली की खपत होगी। 2017 में बिटकॉइन नेटवर्क ने एक साल में 30 टेरावॉट आवर्स (TWh) बिजली का इस्तेमाल किया था। व्रीज के मुताबिक अब यह खपत लगभग दोगुनी हो गई है। अभी यह 78 से 101 टेरावॉट आवर्स के बराबर है। यह नॉर्वे की बिजली खपत के बराबर है।
हर बिटकॉइन ट्रांजैक्शन में औसतन करीब 300 किलो कार्बन डाईऑक्साइड की जरूरत होती है जो 750000 क्रेडिट कार्ड स्वाइप से निकले कार्बन फुटप्रिंट के बराबर है। अगर बिटकॉइन कोई देश होता तो इसकी बिजली खपत ऑस्ट्रिया या बांग्लादेश से अधिक होती। बिटकॉइन माइनिंग में न केवल भारी मात्रा में बिजली की खपत होती है बल्कि समस्या यह भी है कि अधिकांश माइनिंग फैसिलिटीज ऐसे इलाकों में स्थित है जो कोयला आधारित बिजली पर निर्भर हैं
बिटकॉइन कैसे करता है काम?बिटकॉइन विशेषज्ञ हितेश मालवीय बताते हैं कि बिटकॉइन वर्चुअल कॉइन हैं, जो अपनी कीमत बनाने और बढ़ाने के लिए डिजाइन किए गए हैं। इस तरह पैसों के लेन-देन के लिए आपकों बैंकों तक जाने की जरूरत नहीं है। अगर किसी भी व्यक्ति के पास बिटकॉइन है, तो इसकी कीमत और वैल्यू ठीक उसी तरह मानी जाएगी जैसे ईटीएफ में कारोबार करते समय सोने की कीमत मानी जाती है। इस बिटकॉइन से आप ऑनलाइन शॉपिंग भी कर सकते हैं और इसे निवेश के रूप में भी संभाल कर रख सकते हैं। बता दें कि ये बिटकॉइन एक पर्सनल ई-वॉलेट से दूसरे पर्सनल ई-वॉलेट में ट्रांसफर भी किए जाते हैं। ये ई-वॉलेट्स आपका निजी डेटाबेस होते हैं, जिसे आप अपने कंप्यूटर, लैपटॉप, स्मार्टफोन, टैबलेट या किसी ई-क्लाउड पर स्टोर करते हैं।
कैसे होती है बिटकॉइन की ट्रेडिंग? Kraken के जरिए बिटकॉइन ट्रेडिंग की जा सकती है। इसके लिए पहले अपना अकाउंट बनाना होता है। इसके बाद ईमेल के जरिए अकाउंट कन्फर्म करना होता है। अकाउंट वेरिफाइ होने के बाद आप ट्रेडिंग मेथड सिलेक्ट कर सकते हैं। ट्रेडिंग के लिए चार्ट मौजूद होता है जिसमें बिटकॉइन की कीमत की हिस्ट्री होती है। आप समय पर बिटकॉइन का ऑर्डर देकर खरीद सकते हैं और बेच सकते हैं। बिटकॉइन की कीमतों में बदलाव बहुत ही अप्रत्याशित और तेज होता है इसलिए इसमें खतरा बना रहता है। पिछले 24 घंटों में ही इसमें तगड़ी गिरावट आई है। इसकी कीमत 8.80 लाख रुपये के करीब जा पहुंची थी, जो खबर लिखे जाने तक घटकर 8.31 लाख के करीब आ चुकी है।
इन मैलिसियस एप्स के फोन में इंस्टॉल होने से हैकर्स आपकी बैकिंग डिटेल की चोरी कर सकते हैं। ऐसे में अगर आपके मोबाइल फोन में ये 10 खतरनाक एप्स इंस्टॉल हैं तो तुरंत इन्हें अनइंस्टॉल कर दें। वरना आपको नुकसान उठाना पड़ सकता है। Telegram group :http://@Technicalmechzone
नई दिल्ली, टेक डेस्क। अगर आप मोबाइल फोन से डिजिटल लेनदेन यानि पैसों का ऑनलाइन ट्रांजैक्शन करते हैं, तो आपको कुछ बातों को लेकर सावधानी बरतनी चाहिए। दरअसल चेक प्वाइंट रिसर्च में एक नये खतरनाक मैलिसियस एप्स के सेट की पहचान हुई है, जो आपके वित्तीय लेनदेन को नुकसान पहुंचा सकते हैं। मतलब इन मैलिसियस एप्स के फोन में इंस्टॉल होने से हैकर्स आपकी बैकिंग डिटेल की चोरी कर सकते हैं। ऐसे में अगर आपके मोबाइल फोन में ये 10 खतरनाक एप्स इंस्टॉल हैं, तो तुरंत इन्हें अनइंस्टॉल कर दें। वरना आपको नुकसान उठाना पड़ सकता है।
Google को चकमा देने में सक्षम हैं ये मोबाइल एप्स
चेक प्वाइंट रिसर्च के ब्लॉग पोस्ट के मुताबिक, जिन 10 एंड्राइड एप्स की पहचान हुई है,जो Clast82 नामक ड्रॉपर से संक्रमित हुए हैं, जो किसी व्यक्ति के स्मार्टफोन में AlienBot Banker और MRAT इंस्टॉल करता है। एलियनबोट एक प्रकार का मैलवेयर है, जो फाइनेंशियल एप्स को प्रभावित कर सकता है और बैकिंग डिटेल को चोरी करने का काम करता है। यह ड्रापर इतने शक्तिशाली हैं, जो आसानी Google को धोखा देकर बच निकलने में सक्षम है। साथ ही टू-फैक्टर ऑथेंटिकेशन कोड को भी चकमा दे सकते हैं। इससे वित्तीय लेनदेन में नुकसान उठाना पड़ सकता है।
चेन प्वाइंट रिसर्च ने इस बाबत Google से बातचीत करके Google Play Store से इन दस खतरनाम एप्स को हटाने की मांग की है। Google ने साफ किया है कि कंपनी इन सभी एप्स को हटा दिया गया है, लेकिन अगर इसके बावजूद आपके फोन में ये खतरनाक एप्स मौजूद हैं, तो तुरंत हटा दें। बता दें Google की तरफ से भी समय-समय पर Google Play Store से खतरनाक एप्स को हटाया जाता है।
अफ्रीका (Afrcia) के सहारा रेगिस्तान (Sahara Desert) में एक उल्कापिंड (Meteroite) मिला है जो पृथ्वी (Earth) के बनने से पहले बना था. इससे सौरमंडल में ग्रह निर्माण की प्रक्रिया के बारे में पता चल सकता है.उल्कापिंड (Meteorite) के बारे में कहा जाता है कि वह उस समय के होते हैं जब हमारे सौरमंडल (Solar System) में पृथ्वी (Earth) जैसे ग्रहों का निर्माण हो रहा था. लेकिन शोधकर्ताओं ने अफ्रीका के सहारा रेगिस्तान (Sahara Desert) में एक उल्कापिंड की चट्टान का टुकड़ा खोजा है जो पृथ्वी से भी पुराना बताया जा रहा है. यह पत्थर एक ऐसे ग्रह का माना जा रहा जिसका निर्माण शुरू ही हुआ था और तक तक पृथ्वी अपने अस्तित्व में भी नहीं आई थी
क्या खास है इस उल्कापिंड में :इस उल्कापिंड को Erg Chech 002 या EC 002 नाम दिया गया है. शोधकर्ताओं के अनुसार यह एक पुरातन प्रोटोप्लैनेट की पर्पटी के अंदर बना था. प्रोटोप्लैनेट ग्रहों के मूल रचना खंड होते हैं. शोधकर्ताओं का कहना है कि यह अब तक का सबसे पुराना ज्ञात लावा है जो पृथ्वी पर गिरा है. इसका अध्ययन करने से हमारे सौरमंडल के शुरुआती समय में ग्रहों की निर्माण के बारे में जानकारी मिल सकती है.
कहां मिला है यह उल्कापिंड यह पत्थर अफ्रीका के अलजीरिया के अर्ग चेच ड्यून सागर में मिला था और उसकी आधार पर उसे नाम दिया गया है. वास्तव में यह बहुत सारे उल्कापिंडों से बना है और उसका वजन 70 पाउंड यानि करीब 32 किलो का है. शोधकर्ताओं ने इसका विश्लेषण कर पाया है कि पर्पटी का यह टुकड़ा लावा की तरह पिघला हुआ था और उसके बाद क्रिस्टलीकरण होकर वह ठोस बन गया.
कितना पुराना इस पत्थर के मैग्नीशियम और एल्यूमीनियम आइसोटोप्स के अध्ययन से पता चला है कि यह 4.566 अरब साल पुराना है जो अभी तक पाया गया सबसे पुराना आग्नेय शैल है. इससे पहले आग्नेय शैल वाला उल्कापिंड NWA11119 था जो EC002से 12.4 लाख साल छोटा है. पृथ्वी ईन पत्थरों से कई लाख सालों के बाद अस्तित्व में आई थी.
किससे बना है यह उल्कापिंड यह उल्कापिंड में 58 प्रतिशत सिलिकॉन डाइऑक्साइड है जिससे पता चलता है कि पुराने पिंड के एंडेसाइट चट्टान की पर्पटी से बनी है. यह पृथ्वी के ज्वालामुखी इलाकों में पाई जाने वाली बेसाल्ट चट्टान से काफी अलग है. यह पभी पता चला है कि ऐसी पर्पटी हमारे सौरमंडल के शुरुआती समय में क्षुद्रग्रह और प्रोटोप्लैनेट में पाई जाती थी और आज यह बहुत ही कम पाई जाती है.
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बहुत ही ज्यादा अलग
प्रोसिडिसिंग्स ऑफ द नेशनल एकेडमी ऑफ साइंसेस में प्रकाशित इस अध्ययन की प्रमुख लेखिका और फ्रांस की वेस्टर्न ब्रिटैनी यूनिवर्सिटी में जियोकैमिस्ट्री की प्रोफेसरजीन एलिक्स बैरेट कहती हैं कि EC 002 दूसरे क्षुद्रग्रह समूहों से स्पष्ट तौर पर अलग है. किसी भी पिंड की स्पैक्ट्रल विशेषताएं इससे अभी तक कहीं भी मेल नहीं खाती नहीं दिखी हैं.
कम क्यों दिखते हैं ऐसे पिंड बैरेट का दावा है कि पुरातन पर्पटी के अवशेष उल्कापिंड केरिकॉर्ड में न केवल बहुत ही कम पाए गए हैं, बल्कि ये आज के क्षुद्रग्रह की पट्टी में भी बहुत ही कम हैं. इससे यह संकेत मिलता है कि सौरमंडल के शुरुआती प्रोटोप्लैनेट और उनकी ज्यादातर टुकड़े या तो निश्चित तौर पर खत्म हो गए था. या फिर बढ़ते पथरीले ग्रहों से जुड़ते गए थे. यही वजह रही होगी पुरातन पर्पटी से निकलने वाले इस तरह के उल्कापिंड अपवाद की तरह दिख रहे हैं.माना जा रहा है कि EC 002 अपने मूल प्रोटोप्लैनेट की पर्पटी के ठंडे होने और क्रिटलीकरण होने के दशकों बाद निकला होगा जिससे वह उस समय के ग्रहों के क्रोड़ के विकास की जानकारी दे रहा है जब हमारी पृथ्वी अस्तित्व में ही नहीं थी.
निम्नलिखित सामान्य ज्ञान पर आधारित प्रश्नों के उत्तर दें और प्रत्येक प्रश्न के उत्तर की व्याख्या को भी अध्ययन करें. UPSC, SSC, और राज्य PSCs जैसी सरकारी नौकरी परीक्षाओं की अच्छी तैयारी के लिए इन प्रश्नों को हल करें.
1. भारत का पहला एलिवेटेड अर्बन एक्सप्रेसवे (India’s first elevated Urban Expressway) कहां है?
A. दिल्ली से गुरुग्राम (Delhi to Gurugram) B. लखनऊ से इलाहाबाद (Lucknow to Allahabad) C. मुंबई से पुणे (Mumbai to Pune) D. चेन्नई से बेंगलुरु (Chennai to Bengaluru) Ans. A व्याख्या: एलिवेटेड अर्बन एक्सप्रेसवे (Elevated Urban Expressway) द्वारका, दिल्ली को गुरुग्राम से जोड़ता है. इसका निर्माण भारतमाला परियोजना के तहत किया जा रहा है.
2. निम्नलिखित में से कौन सा कथन एलिवेटेड अर्बन एक्सप्रेसवे (Elevated Urban Expressway) के बारे में सही है.
1. एक्सप्रेसवे चार पैकेजों (Four packages) में बनाया जा रहा है. 2. इसकी लगभग 18.9 किलोमीटर की लंबाई हरियाणा में और लगभग 10.1 किलोमीटर की लंबाई दिल्ली में होगी. A. केवल 1 B. केवल 2 C. 1 और 2 दोनों D इनमे से कोई भी नहीं Ans. C व्याख्या: लगभग 29 किलोमीटर का एक्सप्रेसवे, जो द्वारका, दिल्ली को गुरुग्राम से जोड़ता है, का निर्माण भारतमाला परियोजना के तहत किया जा रहा है. एक्सप्रेसवे चार पैकेजों में बनाया जा रहा है. इसकी लगभग 18.9 किलोमीटर की लंबाई हरियाणा में और लगभग 10.1 किलोमीटर की लंबाई दिल्ली में होगी.
3. भारत में राजमार्ग क्षेत्र के लिए अम्ब्रेला परियोजना (Umbrella project) कौन सी है?
A. सागरमाला परियोजना (Sagarmala Project) B. स्वर्णिम चतुर्भुज (Golden Quadrilateral) C. भारतमाला परियोजना (Bharatmala Project) D. राष्ट्रीय कॉरिडोर परियोजना (National Corridor Project) Ans. C व्याख्या: भारतमाला को भारत के राजमार्ग क्षेत्र के लिए एक नया अम्ब्रेला परियोजना (Umbrella project) कहा जा सकता है, जो पूरे देश में माल ढुलाई और यात्री आवाजाही की दक्षता के अनुकूलन पर केंद्रित है.
4. GISAT-1 क्या है?
A. Geo Imaging Satellite B. Geo Stationary Satellite C. Geosynchronous Satellite D. इनमें से कोई भी नहीं Ans. A व्याख्या: GISAT-1 एक Geo Imaging Satellite है जिसे आंध्रप्रदेश के नेल्लोर जिले में स्थित श्रीहरिकोटा अंतरिक्षयान से GSLV-F10 रॉकेट द्वारा अंतरिक्ष में भेजने की योजना है.
5. GISAT-1 का उद्देश्य क्या है?
1. यह लगातार अंतराल पर भारतीय उपमहाद्वीप के बड़े क्षेत्र की वास्तविक समय की इमेजिंग प्रदान करेगा. 2. यह उपग्रह प्राकृतिक आपदाओं या किसी अल्पकालिक घटनाओं / प्रकरणों की त्वरित निगरानी के लिए सहायक होगा. A. केवल 1 B. केवल 2 C. 1 और 2 दोनों D इनमे से कोई भी नहीं Ans. C व्याख्या: यह लगातार अंतराल पर भारतीय उपमहाद्वीप के बड़े क्षेत्र की वास्तविक समय की इमेजिंग प्रदान करेगा. यह उपग्रह प्राकृतिक आपदाओं या किसी अल्पकालिक घटनाओं / प्रकरणों की त्वरित निगरानी के लिए सहायक होगा. यह कृषि, वानिकी, खनिज विज्ञान इत्यादि के वर्णक्रमीय हस्ताक्षर (Spectral signatures)प्राप्त करने में मदद करेगा.
6. निम्नलिखित में से किसके द्वारा NETRA प्रोजेक्ट की शुरुआत की गई?
A. ISRO B. DRDO C. Indian Army D. NASA Ans. A व्याख्या: ISRO द्वारा NETRA प्रोजेक्ट की शुरुआत की गई थी, जो अंतरिक्ष मलबे और अंतरिक्ष के अन्य खतरों से उपग्रहों को बचाने के लिए एक प्रारंभिक चेतावनी प्रणाली है.
7. टाइम मैगज़ीन द्वारा किसे ‘फर्स्ट एवर किड ऑफ द ईयर’ (‘First ever Kid of the Year’) से सम्मानित किया गया है?
A. Gitanjali Rao B. Emmanuelle Charpentier C. Jennifer A Doudna D. Kalli Purie Ans. A व्याख्या: पंद्रह वर्षीय वैज्ञानिक और आविष्कारक गीतांजलि राव (Gitanjali Rao) को टाइम पत्रिका के पहले ‘किड ऑफ द ईयर’ (‘First ever Kid of the Year’) के रूप में चुना गया.
8. कैप्टन तानिया शेरगिल (Captain Tania Shergill) के बारे में सही कथन चुनें.
1. कैप्टन तान्या शेरगिल(Captain Tania Shergill) ने नई दिल्ली में गणतंत्र दिवस परेड में Corps of Signals की एक सर्व-पैदल मार्च (All-men marching contingent) का नेतृत्व किया. 2. वह सेना दिवस समारोह के इतिहास में पहली महिला परेड एडजुटेंट (Adjutant) हैं. A. केवल 1 B. केवल 2 C. 1 और 2 दोनों D इनमे से कोई भी नहीं Ans. C व्याख्या: कैप्टन तान्या शेरगिल(Captain Tania Shergill) ने नई दिल्ली में गणतंत्र दिवस परेड में Corps of Signals की एक सर्व-पैदल मार्च (All-men marching contingent) का नेतृत्व किया. वह सेना दिवस समारोह के इतिहास में पहली महिला परेड एडजुटेंट (Adjutant) हैं.
9. भारतीय रेलवे द्वारा घोषित नया रेलवे हेल्पलाइन नंबर (new Railway Helpline Number) क्या है?
A. 121 B. 139 C. 111 D. 911 Ans. B व्याख्या: भारतीय रेलवे ने सभी हेल्पलाइन नंबरों को मर्ज करने का फैसला किया है और सभी प्रकार के प्रश्नों और शिकायतों के लिए एक नए एकल नंबर 139 की घोषणा की है. रेलवे के अन्य सभी हेल्पलाइन नंबरों को बंद कर एक अप्रैल 2021 से 139 में विलय कर दिया जाएगा.
10. कलारीपयट्टू (Kalaripayattu) क्या है?
A. केरल की नौका दौड़ B. वह बुलफाइट जो केरल में होती है C. तमिलनाडु में आयोजित खेल D. इस खेल की शुरुआत केरल में हथियारों के इस्तेमाल से हुई थी Ans. D व्याख्या: कलारीपयट्टू (Kalaripayattu) एक खेल है जिसकी उत्पत्ति केरल में हुई थी. इसमें chattom (jumping), ottam (running) और marichil (somersault) और तलवार, खंजर, भाले, धनुष और तीर जैसे हथियार शामिल हैं.
गुफाओं में रहने वाले आदिमानव आखिर कैसे थे. आधुनिक विज्ञान के लिए यह सवाल आज भी पहेली है. पर इस बारे में खोज कर रहे वैज्ञानिकों का कहना है कि बीस लाख साल पहले धरती पर रहने वाले लोग हमसे अच्छी खुराक लेते थे.
लंबे वक्त तक यह माना जाता रहा कि गुफा में रहने वाले मानव सिर्फ मांस खाते थे. लेकिन अब यह भ्रम साबित हो रहा है. वैज्ञानिकों का कहना है कि पाषाण युग के इंसान फल, जड़ें, फलों के गूदे और मांस खाते थे. वैज्ञानिकों की एक रिसर्च टीम कहती है कि अगर गुफा मानव की खुराक का हिसाब मिल जाए, तो 21वीं सदी के इंसान की कई तकलीफें दूर हो जाएंगी. पौष्टिकता के आधार पर आहार और डाइट की सही पहचान हो सकेगी.
25 लाख साल पहले से लेकर 12,000 साल पहले के इस दौर में न आलू था, न ब्रेड थी. दूध का भी अता पता नहीं था. आज इन्हें मुख्य आहार माना जाता है. कृषि की शुरुआत को गुफा मानव के युग के बाद आज से करीब 10 हजार साल पहले हुई. ऐसे में यह सवाल उठ रहा है कि किसकी डाइट बेहतर है. आदम इंसान की या हमारी. शरीर, कद काठी, शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य इशारा करता है कि गुफा में रहने वाले हमसे ज्यादा सेहतमंद थे.
यूनीलीवर कंपनी के लिए शोध की अगुवाई कर रहे वैज्ञानिक डॉक्टर मार्क बेरी कहते हैं कि उनका उद्देश्य आज के लोगों के लिए सेहतमंद खुराक तैयार करना है. वह कहते हैं, “पाषाण युग के आहार में कई तरह के पौधे शामिल थे. आज हम एक दिन ज्यादा से ज्यादा एक सब्जी या पांच फल खा लेते हैं. वे लोग एक दिन में 20 से 25 प्रकार की साग सब्जी खाया करते थे.”
आज हम फसलें उगाते हैं और वह हमारे भोजन का अहम हिस्सा हैं. वहीं शताब्दियों पुराने इंसान कम कार्बोहाइड्रेट, कम वसा वाला खाना खाते थे. वह ज्यादा से ज्यादा साग सब्जियां खाते थे. अब सवाल उठता है कि स्वस्थ्य आहार कौन सा है. लंदन यूनिवर्सिटी में वंशानुगत बदलावों के प्रोफेसर मार्क थोमस कहते हैं कि गुफा मानव की डाइट ज्यादा बेहतर थी. पुराने शोध बताते हैं कि पत्थरों के सहारे अपनी रक्षा करने वाले गुफा मानवों को आहार की अधिकता संबंधी बीमारियां बहुत कम होती थी. उन्हें दो तरह की डायबिटीज नहीं थी, मोटापे का तो अता पता ही नहीं था. वैज्ञानिक दूध का उदाहरण देते हैं.
मार्क थोमास कहते हैं, “धीरे धीरे डाइट में कई बदलाव हुए. कई चीजें नई आई और कई गुम हो गई. दूध का ही उदाहरण ले लीजिए. 10 हजार हमसे बेहतर था आदिमानव का खानपान
गुफाओं में रहने वाले आदिमानव आखिर कैसे थे. आधुनिक विज्ञान के लिए यह सवाल आज भी पहेली है. पर इस बारे में खोज कर रहे वैज्ञानिकों का कहना है कि बीस लाख साल पहले धरती पर रहने वाले लोग हमसे अच्छी खुराक लेते थे. लंबे वक्त तक यह माना जाता रहा कि गुफा में रहने वाले मानव सिर्फ मांस खाते थे. लेकिन अब यह भ्रम साबित हो रहा है. वैज्ञानिकों का कहना है कि पाषाण युग के इंसान फल, जड़ें, फलों के गूदे और मांस खाते थे. वैज्ञानिकों की एक रिसर्च टीम कहती है कि अगर गुफा मानव की खुराक का हिसाब मिल जाए, तो 21वीं सदी के इंसान की कई तकलीफें दूर हो जाएंगी. पौष्टिकता के आधार पर आहार और डाइट की सही पहचान हो सकेगी.
खाते जाओ खाते जाओ 25 लाख साल पहले से लेकर 12,000 साल पहले के इस दौर में न आलू था, न ब्रेड थी. दूध का भी अता पता नहीं था. आज इन्हें मुख्य आहार माना जाता है. कृषि की शुरुआत को गुफा मानव के युग के बाद आज से करीब 10 हजार साल पहले हुई. ऐसे में यह सवाल उठ रहा है कि किसकी डाइट बेहतर है. आदम इंसान की या हमारी. शरीर, कद काठी, शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य इशारा करता है कि गुफा में रहने वाले हमसे ज्यादा सेहतमंद थे.
यूनीलीवर कंपनी के लिए शोध की अगुवाई कर रहे वैज्ञानिक डॉक्टर मार्क बेरी कहते हैं कि उनका उद्देश्य आज के लोगों के लिए सेहतमंद खुराक तैयार करना है. वह कहते हैं, “पाषाण युग के आहार में कई तरह के पौधे शामिल थे. आज हम एक दिन ज्यादा से ज्यादा एक सब्जी या पांच फल खा लेते हैं. वे लोग एक दिन में 20 से 25 प्रकार की साग सब्जी खाया करते थे.”
आज हम फसलें उगाते हैं और वह हमारे भोजन का अहम हिस्सा हैं. वहीं शताब्दियों पुराने इंसान कम कार्बोहाइड्रेट, कम वसा वाला खाना खाते थे. वह ज्यादा से ज्यादा साग सब्जियां खाते थे. अब सवाल उठता है कि स्वस्थ्य आहार कौन सा है. लंदन यूनिवर्सिटी में वंशानुगत बदलावों के प्रोफेसर मार्क थोमस कहते हैं कि गुफा मानव की डाइट ज्यादा बेहतर थी. पुराने शोध बताते हैं कि पत्थरों के सहारे अपनी रक्षा करने वाले गुफा मानवों को आहार की अधिकता संबंधी बीमारियां बहुत कम होती थी. उन्हें दो तरह की डायबिटीज नहीं थी, मोटापे का तो अता पता ही नहीं था. वैज्ञानिक दूध का उदाहरण देते हैं.
मार्क थोमास कहते हैं, “धीरे धीरे डाइट में कई बदलाव हुए. कई चीजें नई आई और कई गुम हो गई. दूध का ही उदाहरण ले लीजिए. 10 हजार
आजकल ऐसे खाते पीते लोगों की कमी नहीं साल पहले इंसान ने दूध खोजा. पहले हम दूध को पचा नहीं पाते थे. लेकिन अब यह चीज आदत में ढल गई है. अब हम 100 फीसदी दूध या उससे बनी चीजें खाने पीने लगे हैं.” वैज्ञानिकों के मुताबिक आदिमानव जिस तरह की साग सब्जियां खाते थे, उससे हमारा खाना एक दम अलग हो चुका है. आहार संबंधी मामलों की एक और विशेषज्ञ प्रोफेसर मोनिक सिमंड्स कहती हैं, “कृषि के विकास का मॉडल पैसा कमाने पर आधारित है. पौष्टिक आहार पैदा करने के बजाय अब ऐसी फसलों की पैदावार की जा रही है जिनका अंतरराष्ट्रीय बाजार है…गेहूं इसकी का उदाहरण है.”
इस बात पर वैज्ञानिक एक मत हैं कि मौजूदा दौर में इंसान अनाज पर ज्यादा निर्भर हो गया है. अनाज की कई किस्में बाजार हैं. लेकिन शोधकर्ताओं को अफसोस है कि असली पौधे और उसके गुण इस बदलाव की भेंट चढ़ रहे हैं. शोध करने वालों का सुझाव है कि लोगों को चीनी और अति कार्बोहाइट्रेट वाले आहार से बचना चाहिए. उनकी जगह ऐसी चीजों का इस्तेमाल करना चाहिए जिन्हें अनदेखा किया जा रहा है.
धीरे धीरे यह बात साफ होने लगी है कि खाने पीने की इन बदली आदतों ने कई नई और घातक बीमारियों को भी जन्म दिया है. यह भी एक वजह है कि आज का इंसान अपने पूर्वजों की तुलना में शारीरिक रुप से कमजोर हो चुका है. इसका प्रमाण देने के लिए कुछ वैज्ञानिक आदिवासियों का अध्ययन कर रहे हैं. अब भी पुराने तरीके से रहे रहे दुनिया भर के कई कबीलों में आंख, दांत, गले, दिल और फेफड़े की बीमारियां न के बराबर हैं. उनके अध्ययन के आधार पर कहा जा रहा है कि हमें गाजर, अंडे, चिकन, रसीले फल, बादाम, मूली, शलजम और अखरोट जैसी चीजें ज्यादा खानी चाहिए. शुरुआत में हमारे पाचन तंत्र को एक बदलाव से गुजरना होगा, लेकिन देर सबेर इस आहार का अच्छा असर सेहत पर पड़ने लगेगा.
Justin Maki, NASA Perservere imaging scientist and instrument operations team chief, reveals a full panorama the rover captured from the surface of Mars
The video clip showed the deployment of the parachute and the rover’s touchdown on the surface of the Red Planet
The U.S. space agency NASA on Monday released the first audio from Mars, a faint crackling recording of a gust of wind captured by the Perseverance rover
NASA also released the first video of last week’s landing of the rover, which is on a mission to search for signs of past life on the Red Planet.
A microphone did not work during the rover’s descent to the surface, but it was able to capture audio once it landed on Mars.
NASA engineers played a 60-second recording
What you hear there 10 seconds in is an actual wind gust on the surface of Mars picked up by the microphone and sent back to us here on Earth,” said Dave Gruel, lead engineer for the camera and microphone system on Perseverance.
The high-definition video clip, lasting three minutes and 25 seconds, shows the deployment of a red-and-white parachute with a 70.5-foot-wide (21.5-meter-wide) canopy.
It shows the heat shield dropping away after protecting Perseverance during its entry into the Martian atmosphere and the rover’s touchdown in a cloud of dust in the Jezero Crater just north of the Red Planet’s equator.
“This is the first time we’ve ever been able to capture an event like the landing on Mars,” said Michael Watkins, director of NASA’s Jet Propulsion Laboratory, which is managing the mission.
“These are really amazing videos,” Mr. Watkins said. “We binge-watched them all weekend.”
Thomas Zurbuchen, NASA’s associate administrator for science, said the video of Perseverance’s descent is “the closest you can get to landing on Mars without putting on a pressure suit.”
Perseverance is healthy’ Jessica Samuels, Perseverance’s surface mission manager, said the rover was operating as expected so far and engineers were conducting an intensive check of its systems and instruments.
“I am happy to report that Perseverance is healthy and is continuing with activities as we have been planning them,” Ms. Samuels said.
She said the team was preparing for a flight by the rover’s small helicopter drone dubbed Ingenuity.
“The team is still evaluating,” she said. “We have not locked in a site yet.”
Ingenuity will attempt the first powered flight on another planet and will have to achieve lift in an atmosphere that is just one percent the density of Earth’s.
Perseverance was launched on July 30, 2020 and landed on the surface of Mars on Thursday.
Its prime mission will last just over two years but it is likely to remain operational well beyond that. Its predecessor Curiosity is still functioning eight years after landing on Mars.
Over the coming years, Perseverance will attempt to collect 30 rock and soil samples in sealed tubes to be sent back to Earth sometime in the 2030s for lab analysis.
About the size of an SUV, the craft weighs a ton, is equipped with a seven-foot-long robotic arm, has 19 cameras, two microphones and a suite of cutting-edge instruments.
Mars was warmer and wetter in its distant past, and while previous exploration has determined the planet was habitable, Perseverance is tasked with determining whether it was actually inhabited.
It will begin drilling its first samples in summer, and along the way it will deploy new instruments to scan for organic matter, map chemical composition and zap rocks with a laser to study the vapor.
One experiment involves an instrument that can convert oxygen from Mars’ primarily carbon dioxide atmosphere, much like a plant.
The idea is that humans eventually won’t need to carry their own oxygen on hypothetical future trips, which is crucial for rocket fuel as well as for breathing.
The rover is only the fifth to set its wheels down on Mars. The feat was first accomplished in 1997, and all of them have been American.
The United States is preparing for an eventual human mission to the planet, though planning remains very preliminary.
The first image sent by NASA’s Perseverance rover upon touching down on Mars shows its shadow upon the Red Planet’s surface, at the Jezero crater.
The rover will begin its search for traces of ancient microbial life on Mars
NASA’s science rover Perseverance, the most advanced astrobiology laboratory ever sent to another world, streaked through the Martian atmosphere on Thursday and landed safely on the floor of a vast crater, its first stop on a search for traces of ancient microbial life on the Red Planet.
Mission managers at NASA’s Jet Propulsion Laboratory near Los Angeles burst into applause and cheers as radio signals confirmed that the six-wheeled rover had survived its perilous descent and arrived within its target zone inside Jezero Crater, site of a long-vanished Martian lake bed.
The robotic vehicle sailed through space for nearly seven months, covering 293 million miles (472 million km) before piercing the Martian atmosphere at 12,000 miles per hour (19,000 km per hour) to begin its approach to touchdown on the planet’s surface.
The spacecraft’s self-guided descent and landing during a complex series of maneuvers that NASA dubbed “the seven minutes of terror” stands as the most elaborate and challenging feat in the annals of robotic spaceflight.
“It really is the beginning of a new era,” NASA’s associate administrator for science, Thomas Zurbuchen, said earlier in the day during NASA’s webcast of the event.
The landing represented the riskiest part of two-year, $2.7 billion endeavor whose primary aim is to search for possible fossilized signs of microbes that may have flourished on Mars some 3 billion years ago, when the fourth planet from the sun was warmer, wetter and potentially hospitable to life.
Scientists hope to find biosignatures embedded in samples of ancient sediments that Perseverance is designed to extract from Martian rock for future analysis back on Earth – the first such specimens ever collected by humankind from another planet.
Two subsequent Mars missions are planned to retrieve the samples and return them to NASA in the next decade.
Thursday’s landing came as a triumph for a pandemic-weary United States in the grips of economic dislocation caused by the COVID-19 public health crisis.
Search for ancient life NASA scientists have described Perseverance as the most ambitious of nearly 20 U.S. missions to Mars dating back to the Mariner spacecraft’s 1965 fly-by.
Larger and packed with more instruments than the four Mars rovers preceding it, Perseverance is set to build on previous findings that liquid water once flowed on the Martian surface and that carbon and other minerals altered by water and considered precurors to the evolution of life were present.
Perseverance’s payload also includes demonstration projects that could help pave the way for eventual human exploration of Mars, including a device to convert the carbon dioxide in the Martian atmosphere into pure oxygen.
The box-shaped tool, the first built to extract a natural resource of direct use to humans from an extraterrestrial environment, could prove invaluable for future human life support on Mars and for producing rocket propellant to fly astronauts home.
Another experimental prototype carried by Perseverance is a miniature helicopter designed to test the first powered, controlled flight of an aircraft on another planet. If successful, the 4-pound (1.8-kg) helicopter could lead to low-altitude aerial surveillance of distant worlds, officials said.
The daredevil nature of the rover’s descent to the Martian surface, at a site that NASA described as both tantalizing to scientists and especially hazardous for landing, was a momentous achievement in itself.
The multi-stage spacecraft carrying the rover soared into the top of Martian atmosphere at nearly 16 times the speed of sound on Earth, angled to produce aerodynamic lift while jet thrusters adjusted its trajectory.
A jarring, supersonic parachute inflation further slowed the descent, giving way to deployment of a rocket-powered “sky crane” vehicle that flew to a safe landing spot, lowered the rover on tethers, then flew off to crash a safe distance away.
Perseverance’s immediate predecessor, the rover Curiosity, landed in 2012 and remains in operation, as does the stationary lander InSight, which arrived in 2018 to study the deep interior of Mars.
Last week, separate probes launched by the United Arab Emirates and China reached Martian orbit. NASA has three Mars satellites still in orbit, along with two from the European Space Agency.
प्लूटो एक बौना ग्रह है जिसकी खोज 1930 में क्लाइड टॉमबो नाम के वैज्ञानिक ने की थी। यह बौना ग्रह भी अन्य ग्रहों की तरह ही सूर्य की परिक्रमा करता है। लेकिन यह आकार में बहुत छोटा है। इसकी खोज आज ही के दिन यानी 18 फरवरी को हुई थी।
(Technical Mechzone) — A lot of investments have gone berserk lately, but none stand out quite like Bitcoin. Its price quadrupled in a matter of months to touch a record high of more than $41,900 in early January, propelling the cryptocurrency back into the limelight less than three years after a spectacular 75% crash. (It traded at around $36,400 on Jan. 19.)
Posted by Technical Mechzone